डेंगू और मलेरिया से निजात दिलाती हैं चीटियों से बनी बस्तरिया चटनी..

चीटियों से बनी हुई चटनी, भले सुनने में बेहद ही अजीब लग रहा हो! लेकिन आदिवासी बहुल इलाके और खासकर बस्तर में यह चटनी बहुत प्रसिद्ध है। आदिवासी लाल बड़ी चीटियों से बनी हुई चापड़ा चटनी बड़े ही चाव से खाते है, उनका मानना है कि इसके सेवन करने से उन्हें कई तरह की बीमारियों निजात मिलती है।

आदिवासी यह कहते है चापड़ा चटनी को खाने की सीख उन्हें अपनी विरासत से मिली है। इसे बस्तरिया चटनी भी कहा जाता है। बस्तर के हाट बाजार में चापड़ा पांच रुपए दोना में बेचा जाता है। इन चीटियों को आम, अमरूद, साल के पेड़ से लाया जाता है। इन पेड़ों पर यह चीटियां अपना घरौंदा बनाती हैं। इस वजह से चीटियों में खट्टे पन का स्वाद आ जाता है। यह खाने में बिलकुल आम की चटनी की तरह होता हैं।

इसको बनाने के
लिए सबसे पहले आम, अमरूद या साल के पेड़ों से इन्हे पकड़कर इकट्ठा किया जाता है, बाद
में इसमें नमक मिर्च डाल कर पीसा जाता है। बहुत ही कम समय में यह चटनी तैयार किया
जाता है।

आदिवासियों में मान्यता है कि लाल चीटिंयो में औषधीय गुण होता है। इनमें प्रोटीन आयरन कैल्सियम पाया जाता है। ये बीमारियों से बचने में फायदेमंद होती है । आदिवासी यह भी मानते है, कि यदि किसी को बुखार आ जाए। तो उस व्यक्ति को उस स्थान पर बैठाया जाता है, जहां लाल चींटियां होती हैं। चींटियां जब पीड़ित व्यक्ति को काटती हैं तो उसका  बुखार उतर जाता है। आदिवासी और उनके प्राकृतिक नुस्ख़े हमेशा से ही अनोखे ही रहे हैं। कभी बस्तर घुमने जाए, तो इस अनोखी चटनी का स्वाद जरुर लें। 

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