बघवा छत्तीसगढ़ी भाषा में शॉर्ट फिल्म सिनेमा में बेहतरी की उम्मीद जगाती है

लेखक : जिनेन्द्र पारख

बचपन एक ऐसा समय होता है जिसमें अपार स्मृतियाँ समाहित होती हैं। छुटपन में धूल-गारे में खेलना, मिट्टी मुंह पर लगाना, मिट्टी खाना, मां की प्यार भरी डांट-फटकार व रुंआसे होने पर मां का प्यारभरा स्पर्श, आदि।लेकिन इन सबके इतर है बघवा का मुख्या किरदार वीनू का बचपन। वीनू बचपन में ही एक सपना देखने की न केवल हिमाकत करता है बल्कि उसे पूरा करने की ठानता भी है। वीनू पारम्परिक रूप से मनाए जाने वाले मोहर्रम में शेर बनना चाहता था। सुनने में अजीब लग सकता है लेकिन यह बचपन का सपना है जो कोई सीमा नहीं जानता। छोटे शहर के एक मध्यमवर्गीय ब्राह्मण परिवार में पैदा हुए वीनू किसी बंदिशे को, न जानता था न समझता था। समझ आता था तो सिर्फ शेर नाचा जिसे वो पुरे शिद्दत और तन्मयता से करना जानता था। घर वाले लाख समझाते की पढाई में ध्यान दो, उसे धर्म की बेड़ियों में भी जकड़ की कोशिश करते लेकिन वीनू इन सभी सीमाओं को लांघकर अपने सपने को पूरा करने के लिए एक बड़ा कदम उठाता है और सफल भी होता है। इस कहानी के माध्यम से निर्देशक एवं लेखक सृंजय ठाकुर ने सपनों की कीमत को दर्शाने की हर संभव कोशिश की है। कहानी में छोटे शहर के दृश्य और मानसिकता को भी दर्शाया गया है. पूरी फिल्म में कोई नामी कलाकार नहीं है लेकिन फिल्म की स्टोरीलाइन दर्शक को बसाढेती है।

छत्तीसगढ़ में निर्मित यह शार्ट फिल्म एक सफल प्रयोग है। कल्पना को कैसे स्क्रीन पर उतारा जा सकता है यह 30 मिनट में बखूबी देखा जा सकता है। कहानी की नींव मजबूत होने के कारण छत्तीसगढ़ी पैटर्न में बनी इस फिल्म ने एक नया उदहारण प्रस्तुत किया है। मोर छैया भुइया, झन भूलो माँ बापला, हस झन पगली फस जाबे जैसी कुछ फिल्मो को छोड़ दे तो प्रदेश में छत्तीसगढ़ी फिल्मो को बहुत तवज्जो नहीं मिलता है। ऐसा नहीं है की छत्तीसगढ़ी सिनेमा के दर्शक नहीं है अगर दर्शक न होते तो छत्तीसगढ़ी फिल्मे रिकॉर्ड न तोड़ती। छत्तीसगढ़ी सिनेमा में रचनात्मक कहानी, बेहतर प्रोडक्शन की बेहद जरुरत है।

यह फिल्म हर उस दर्शक के लिए है जिसे सिनेमा में मनोरंजन के साथ गुणवत्ता, कहानी और एक महत्वपूर्ण सन्देश की दरकार होती है.बघवा की गुणवत्ता और बनाने के तरीके से यह कहना गलत नहीं होगा की निश्चित ही इस फिल्म को राष्ट्रोय स्तर पर भी लोग पसंद कर सकते है।

यह शार्ट फिल्म 2014 में बनी और तमाम चुनौतियों के बाद 2019 में लोगों के लिए उपलब्ध हुई। फिल्म में एक विशेष बात यही है की इसमें इंग्लिश में सबटाइटल भी है जिससे छत्तीसगढ़ के एक बड़ा वर्ग पसंद भी कर रहा है जो इसे लोकल सिनेमा कहकर दुरी बना लेता था। फिल्म को प्रख्यात अल्पविराम 2016 , SIFF 2019 आदि में न केवल सम्मानित हुई बल्कि अंतर्राष्ट्रीय मंच में सराहना भी हुई है। यह फिल्म यूट्यूब में उपलब्ध है। इस शार्ट फिल्म को छत्तीसगढ़ी सिनेमा जगत में उम्मीद की किरण की तरह भी देखा जा सकता है।

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