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कोरोना सेक्युलर है?

रायपुर |आजकल बड़ी शांति लग रही है, न हिन्दू-मुस्लिम का झगड़ा, न एनसीआर-सीएए का टंटा। पहले किसी दोस्त से मिलो तो उसे बताना पड़ता था की भाई मैं भी तेरी तरह देशभक्त हूँ, और मेरे दादा परदादा सब यहीं पैदा हुए थे, पर अब सब दूर से नमस्कार कर सबसे पहले तबियत पूछ लेते हैं। तो ऐसे में धन्यवाद देना होगा कोरानावायरस को जो अचानक से डिबेट का प्रमुख मुद्दा बन गया है। इसके पीछे सबसे खास बात इस वायरस की शख्‍सियत एवं इसकी विचारधारा। यह वायरस विश्व बंधुत्व में विश्वास करता है। यह अमीर-गरीब, पूंजीपति-समाजवादी, बाहुबली-कमजोर आदि में कोई विभेद नहीं करता है। यह वायरस अपेक्षा से काफी पहले वैश्विक नागरिक बन चुका है और बेरोकटोक एक एक देश के सीमा से दूसरे देश की सीमा में घुस रहा है। यह वायरस ऐसा करते वक्त लोगों की नागरिकता, धार्मिक विश्वास, राष्ट्रीयता आदि में कोई भेद नहीं करता है। इसके लिये चीनी इतालवी, अमरीकी, भारतीय, थाई आदि राष्ट्रीयता वाले विश्व के करीब 120 देश से अधिक देश एक सामान हैं। इसने विश्व के सभी असमानता एवं संघर्ष वालें मुद्दों को एक समान भाव से देखा है। इसके नजर में पुरूष-महिला, काला-गोरा, अगड़ा-पिछड़ा, हिंदू-मुस्लिम, सिख-ईसाई, जैन-पारसी वाली कोई बात ही नहीं है। दूसरे अर्थों में कहें तो यह पहला वायरस है जो इतने शक्तिशाली होने के बाद भी सेक्यूलर है और समानता के विचारधारा पर अपना अडिग विश्वास करता है, यह अपने सिद्धांतों का पूरा ख्याल रखता है। हालांकि यह बात और है कि भारतीय नौकरशाही और सरकार दोनों कोरानावायरस से अपने आपको काफी ताकतवर समझते हैं। शायद यही कारण रहा होगा की जब चीन में यह रोग अपने शुरूआती दौर में था तब भारत सरकार और नौकरशाही ने एयरपोर्टों पर स्कैनर, कुछ एक जगहों पर आईशोलेशन वार्ड बनाकर, मोबाईल कालर टूयून एवं एडवाईजरी जारी कर अपने कर्तव्यों की ईतिश्री मान ली। कोरोना के कहर से बाज़ार बैठ गया, वैश्विक मंदी आ गई, तो इससे देश के बाज़ार को कैसे बचाया जाय? इस कठिन समय में फार्मा कंपनियों एवं कुछेक व्यापारियों को पैसे बनाने की खुली छूट मिल गई है (अर्थव्यवस्था सम्हालने के लिए) । आखिरकार देश के एक प्रतिशत लोगों के पास देश की 50 प्रतिशत GDP पर कब्ज़ा है । तो सैनिटाईजर और एन 95 मास्क की जमाखोरी एवं कालाबाजारी से इन वस्तुओं का बाजार में कृत्रिम आपूर्ति संकट पैदा हो गया है। जिस मास्क का दाम 200-250 रूपये था आज 1,000 से 2500 रूपये तक में मिलने लगा है। भारत में 2 मौतों के बाद जब लगा की स्थिति हाथ से निकलने लगी है तब केरल एवं दिल्ली की सरकारों ने इसे महामारी घोषित कर स्कूल-कालेज, सिनेमाघर आदि 31 मार्च तक बंद करने का आदेश दे दिया है। यह भी बात फैली कि संभवतः मई महिने के अंत तक यह वायरस अपने आप समाप्त हो जाएगा। क्या तब तक जनता हाथ पर हाथ धरे रहेगी? क्या सिर्फ छुट्टियों का घोषणा कर देने मात्र से इस वायरस का फैलाव रोका जा सकता है? क्या जनता को पर्याप्त मात्रा में सैनिटाईजर एवं मास्क पहुंचाना सरकार की जिम्मेदारी नहीं है? जब सरकार को मालूम था कि देश की सीमा काफी सूराखदार और लंबी है तो क्या एयरपोर्टों पर मात्र स्कैनर लगाने से संक्रमण को भारत आने से रोका जा सकता है? सरहदों एवं बंदरगाहों पर जो टीमें लगाई गई उसके डिप्लॉयमेंट में देरी क्यूं हुई? सोशल मीडिया में तैरते के वीडियों में एक केंद्रीय मंत्री ‘गो करोना’ के नारे लगाते भी दिखें। क्या कोरोना वायरस के विरूद्ध विरोध प्रदर्शन से कोरोना वायरस भारत से भाग जाएगा। इन तमाम तरह की अवव्यवस्थाओं के बावजूद भारत की जनता सरकारों को जड़ से उखाड़ फेंकने के खिलाफ क्रांति की बिगुल नहीं फूंकी है। इसलिए वास्तव में वे धन्यवाद के पात्र हैं क्योंकि हमारा देश भारत महान है और हम नागरिक उससे भी महान हैं। (यह लेख रायपुर के वरिष्ठ पत्रकार अवधेश मलिक ने लिखा है. यहाँ व्यक्त किये गए विचार उनके निजी हैं)

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