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समाज और परिवार से निकाली गई किन्नर, अब बन रही है मिसाल

बन के सहारा, संवार रही है कई बच्चों की जिंदगियां

जानिए नफरत से मोहब्बत तक का यह सफर

पखांजूर। कई बार किन्नरों को लेकर हमारी सोच इतनी छोटी हो जाती है कि हम उन्हें इंसान मानने से ही ईंकार कर देते हैं। उन्हें आए दिन भेदभाव, नृशंसता, क्रूरता, दुत्कार, गाली, गलौज का सामना करना पड़ता है। लेकिन आप अंदाजा भी नहीं लगा सकते हैं कि इतना कुछ सहने के बावजूद वे हमारे बीच मुस्कुराते हुए दिखाई देते हैं। किन्नरों के दिल में कितना कुछ चलते रहता है उसके बावजूद वो हमको आपको दुआएं ही देती रहती है।

एक पल के लिए मान लीजिए कि आप में कुछ प्राकृतिक दोष निकल आया हो और आपको आपके माता-पिता, समाज आपको आपके बाल्यावस्था में छोड़ दें तो.. आपके साथ क्या बीतेगी….हो सकता है कि आपका नज़रिया इस समाज के प्रति नकारात्मक हो जाए। अमूमन होता भी ऐसा ही है। पर किन्नर मनीषा अपने साथ होने वाले इस भेदभाव के खिलाफ उठ खड़ी हुई। उसने किन्नर होने को अभिषाप मानने से ईंकार कर दिया और आज जो मनीषा है – वो सबके सामने है। वो कई अनाथ बच्चों का सहारा बन कर उनकी जिंदगियां संवार रही है। पर क्या ऐसा करना मनीषा के लिए आसान था?


उस दौर को जब मनीषा किन्नर याद करती है तो उसकी आँखे नाम हो जाती है। वे बिलखते हुए बताती है कि जब बचपन में उसके माता-पिता को यह बात चली कि वह किन्नर है तो उसके अपनों ने उसका साथ छोड़ दिया। फिर एक किन्नर ने उसे सहारा दिया।


समाज के ताने और संघर्ष के साथ बड़ी हुई मनीषा आज कईयों के लिए प्रेरणा का स्रोत है। समाज को उसने बन कर दिखा दिया कि वो क्या है? आज वो समाज में संकीर्ण मानषिकता वाले लोगों के लिए वो एक तमाचा है। तो कईयों के लिए वो राह दिखाने वाली एक नायिका।

काफी संघर्षों के बाद बड़ी हुई मनीषा का घर में 9 अनाथ बच्चों के लिए एक आसरा है। वो उनका सहारा है। मनीषा उन्हें अपने बच्चों की तरह पालती है। अपने हाथों से खाना खिलाना, उनके पढाई-लिखाई से लेकर उनके परवरिश तक की सभी जिम्मेदारी एक अभिभावक की तरह उठाती है। वह उन्हें वो तमाम सुविधाएं उपलब्ध कराने की कोशिश करती है जो बचपन में उसे नहीं मिला।


खुद के घर को बेसहारों का सहारा बनाने के पीछे भी एक रोचक कहानी है।


मनीषा बताती है कि एक दिन वे लोग कहीं से बधाई मांगकर वापिस आ रहे थे तभी रास्ते में तड़पते हुए महिला पर नज़र पड़ी। उसे अस्पताल में दाखिला करवाया । लेकिन अस्पताल वाले प्रसव करने से कतरा रहे थे। मनीषा कहती है – “हम उसे अपने घर लाए और प्राइवेट डाक्टर बुलाकर डिलीवरी कराई। वो बेटी को नहीं रखना चाहती थी, इसलिए हमने उसे अपने पास रख लिया। वह महिला पढ़ा-लिखा और संपन्न परिवार से होने के बावजूद लोक लाज के कारण बच्चा को गर्भ में मारना चाहती थी। इसके लिए उसने चूना और गुड़ाखू तक खाया था। लेकिन उपर वाला शुक्र है जच्चा और बच्ची दोनों बच गयी”। उसकी स्वीकृति के बाद हमने बच्ची को गोद ले लिया।

मनीषा आगे बताती है कि वे हमेशा से अपने परिवार के साथ रहना चाहती थी, लेकिन उसके माँ-बाप ने उसे नहीं अपनाया। वो अब भी अपने परिवार के साथ रहना चाहती है, लेकिन उसके परिवार ने मना कर दिया।
मनीषा का सपना है कि बच्चों के लिए वह अनाथ आश्रम खोले। इसके लिए उसने प्रशासन से मदद मांगी है। आश्रम के लिए कई बार नेता और अधिकारियों से बात भी की है लेकिन अब तक कोई सुनवाई नही हुई है।
पर इस बात से मनीषा के हौसले पर कोई फर्क नहीं आया है वो कहती है कि जब भी कोई अनाथ मिलेगा मैं उसे अपने पास ले आऊंगी। उसे सहारा दूंगी।

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