रायपुर। छत्तीसगढ़ के नगरीय निकाय चुनाव में भाजपा को हार मिली है। हार के कारणों की पार्टी समीक्षा करेगी, लेकिन प्रारंभिक तौर पर जो बातें सामने आ रही है, उसमें सबसे खास है कि भाजपा के पिछले 15 साल से जो चेहरे थे, जो नेता थे, जिनके नेतृत्व में चुनाव लड़ा जाता था. जोजो अगुआ थे, उन चेहरों को अब जनता पसंद नहीं कर रही है.

राजधानी रायपुर में भाजपा के वह हर बड़े नेता हारे, जिनसे जीत की उम्मीद थी। उन हर चेहरों को जनता ने नकार दिया, जिनके सिर जीत का सेहरा बंधना था। आखिर ऐसा क्या हुआ की पहली और दूसरी बार चुनाव मैदान में उतरे उम्मीदवारों को वोटरों ने पसंद किया, लेकिन पुराने चेहरों को सिरे से खारिज कर दिया। भाजपा को करीब से जानने और समझने वालों का कहना है कि जनता अब बदलाव चाहती है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के काम पर लोकसभा चुनाव में भले ही छत्तीसगढ़ की 11 में 9 सीट पर भाजपा सांसदों को जीत मिली हो, लेकिन नगरीय निकाय चुनाव, जिसमें स्थानीय मुद्दे होते हैं। राज्य सरकार का काम होता है। उस पर जनता ने कांग्रेस को एक बार फिर समर्थन दिया है। तो क्या यह मान लिया जाए कि जनता पूरी तरह भाजपा के खिलाफ है।

छत्तीसगढ़ के निर्वाचन आयोग के आंकड़ों को देखें तो नगर निगम में भाजपा और कांग्रेस के पार्षदों में बहुत ज्यादा अंतर नहीं है। राजधानी रायपुर में 29 पार्षद भाजपा के जीते, तो 34 कांग्रेस के। मतलब साफ है कि निकाय में कांग्रेस एकतरफा जीत की ओर नहीं है। कहीं ना कहीं एक बड़ा वर्ग भाजपा को अब भी पसंद करता है और उसे वोट कर रहा है।

भाजपा को पसंद करने वाले लोगों ने उन नए और युवा उम्मीदवारों को वोट दिया, जो अभी बेदाग है। जिनके चेहरे साफ सुथरे हैं। जिनकी राजनीति अभी विचारधारा के इर्द-गिर्द घूमती है। जबकि सत्ता के दौरान साइकिल से चलने वाले mercedes-benz तक पहुंच गए उनको जनता ने नकारा है।

आज भाजपा के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही है कि उन चेहरों को किनारे किया जाए। एक नई लीडरशिप तैयार की जाए। युवाओं को संगठन में मौका दिया जाए, क्योंकि अब छत्तीसगढ़ में भाजपा के पास विधानसभा और नगरीय निकाय में कोई अवसर नहीं बचा है। ऐसे में अच्छे, अनुभवी, युवा, मेहनती नेताओं की सूची तैयार करके संगठन में जिम्मेदारी देना चाहिए।

आज जरूरत संगठन को नया तेवर और नया कलेवर देने की है। जमें जमाए नेताओं को केंद्र की राजनीति की तरह मार्गदर्शक मंडल में शामिल करना चाहिए। उनके अनुभव का लाभ लेते हुए युवाओं की एक फौज तैयार करनी चाहिए। प्रदेश में 25 लाख भाजपा के सदस्य हैं, लेकिन नगरीय निकाय चुनाव में इतने वोट भी नहीं मिले। यह बताता है कि भाजपा का वोटर अभी भी विधानसभा चुनाव की तर्ज पर घर में बैठा है। वह नाराज है और पार्टी के पक्ष में मतदान नहीं कर रहा है।

मुख्यमंत्री भूपेश बघेल से जब यह सवाल किया गया है कि क्या नगरीय निकाय चुनाव में हार के लिए डॉक्टर रमन सिंह जिम्मेदार हैं। तो उन्होंने दो टूक कहा की भाजपा सरकार की नीतियों की नाराजगी अब तक वोटरों के दिल में है। यह बताता है कि जो नीति बनाने वाले थे, जो नियम बनाने वाले थे, जिन्होंने सत्ता और संगठन को पिछले 15 साल चलाया, अब उनको वोटर पसंद नहीं कर रहे हैं।

छत्तीसगढ़ में अभी भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष का चुनाव होना है। करीब 11 जिलों में नए जिलाध्यक्ष भी बनाए जाने हैं। संगठन को चाहिए कि युवा नेतृत्व को प्रदेश अध्यक्ष की कमान सौंपें और जिला अध्यक्षों को बदलकर नए और ऊर्जावान नेतृत्व को आगे बढ़ने का अवसर दें। यही एक तरीका है जो डूबती भाजपा को बचा सकती है।

लेखक मृगेंद्र पांडेय वरिष्ठ पत्रकार है और वे रायपुर में सक्रीय रूप से पत्रकारिता करते है।

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