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आप दो नाम वाले महिला प्रत्याशियों को वोट देंगे..जो अपना हक न जान पाई वह आपको क्या हक दिलाएंगी

रायपुर। निकाय के चुनाव चल रहे हैं। आपके मोहल्ले में आरक्षण की वजह से इस बार पुरूष प्रत्याशी को चुनाव लड़ने का मौका नहीं मिल पाया। नतीजा..उनकी पत्नि, मां या दीदी चुनावी मैदान में है।

इसमें दिक्कत क्या है.. दिक्कत तो कुछ भी नहीं.. जो होता आया है वही चल रहा है। मगर सोचिए ! नीरज ममता श्रीवास्तव, रूची मनीष गुप्ता या पारूल रमेश साहु यह नाम सुनकर आपको कैसा लगता है। पंचायती राज से लेकर निकाय के एक्ट में अलग अलग सरकारों से संशोधन करके महिलाओं को सशक्त बनाने की बात कही।

यहां ​महिलाओं की बात हुई थी, किसी पुरूष पर इतना आश्रीत महिला की बात नहीं हुई थी जो चुनाव भी अपने खुद के नाम पर नहीं लड़ सकती। यानी मंशा थी कि महिलाएं सशक्त हों अपने अधिकारों के बारे में जान सकें।

लेकिन हो क्या रहा है!

टिकट ​महिला को मिल रही है चुनाव उनके पति या भाई या बेटे लड़ रहे हैं। जरा सोचिए कि, जो महिला अपने 5 लोगों के परिवार में अपने नाम की बखत न बना पाई वो आपके वार्ड में कौन से चांद सितारे ले आएंगी।

जो अपने पति को इस बात के लिए कनवेंस नहीं कर पाई कि, एजी सुनो जी, पप्पू के पापा जी जैसी उपमाओं के बगैर भी उसका वजूद है।

यानी जो अपने पति को कन्वेंस नहीं कर पा रही वह अपने वार्ड के लिए निगम कमिश्नर को कैसे कन्वेंस कर पाएगी।

कहने का आशय यह है कि, जो महिला अपने अधिकारों को नहीं जान पाई वह आपको कैसे अधिकार दिला सकती है।

और जब उनके पति के नाम के बगैर उन्हें कोई पहचानता ही नहीं है तो सियासत में उनके होने और न होने का क्या मतलब है

यानी जब मानसिकता चूल्हा चौका और पति के चाकरी की हो तो वाइट हाउस और निगम मुख्यालय के सपने सजाने का क्या आशय। तो जब वोट देने जाएं तो अपनी अक्ल इस एंगल से जरूर लगाएं!   

आप चाहें तो हमें पुरूष विरोधी या महिला समर्थक कह सकते, मगर हमें पता है हम महिला अधिकारों की बात कर रहे हैं। असुविधा के लिए खेद है धन्यवाद

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