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छत्तीसगढ़ में हैं लोक संस्कृति की अद्भुत परम्परा जानिए लोकनृत्य करमा के बारे में

छत्तीसगढ़ में लोकनृत्य यूँ तो कई प्रकार हैं, मगर करमा इनमें खास है। करमा नृत्य का सरगुजा से लेकर बस्तर तक विशेष महत्व देखने को मिलता है। इसे सभी जनजातीय क्षेत्रों में प्रमुखता से किया जाता है। इस नृत्य को अलग-अलग क्षेत्रों में अलग-अलग नामों से जाना जाता है लेकिन करमा नृत्य करने से पहले की एक परम्परा सभी जगह एक जैसा है।

करमा वृक्ष का पूजापाठ
करमा की उत्पत्ति के संबंध में कई कथाएं हैं। जैसे- राजा कर्मसेन की कथा, कर्मा रानी की कथा एवं सात भाइयों की कथा में कर्म देव का उल्लेख आदि का विवरण प्राप्त होता है। जो कर्मा पूजा के इर्द-गिर्द करमा नृत्य की उत्पत्ति से संबंधित मालूम पड़ता हैं।

करमा नृत्य

करम वृक्ष की टहनी को भूमि पर गाड़कर चारों ओर घूम-घूम कर करमा नृत्य किया जाता है। करमा नृत्य में पंक्तिबद्धता ही करमा नृत्य का परिचायक है। स्त्री-पुरूष पंक्तिबद्ध होकर नाचते हैं और एक दूसरे का हाथ पकड़कर सीधी पंक्ति में अथवा अर्द्ध घेरे में आमने सामने अथवा दायें-बाएं चलते हुए नाचते हैं। महिलाओं का दल अलग होता है और पुरूषों का दल अलग होता है। नाचने व गाने वालों की संख्या निश्चित नहीं होती है कितने भी नाचने वाले इस नृत्य में शामिल हो सकते हैं। बशर्ते नाचने के लिये पर्याप्त जगह हो।

करमा नृत्य में मांदर और टिमकी दो प्रमुख वाद्य होते हैं जो एक से अधिक तादाद में बजाये जाते हैं। वादक नाचने वालों के बीच में आकर वाद्य बजाते हैं और नाचते हैं। बजाने वालों का मुख हमेशा नाचने वालों की तरफ होता है। मांदर और टिमकी के अलावा कहीं-कहीं मंजीरा, झांझ व बांसुरी भी बजाये जाते हैं। किसी स्थान में नर्तक पैरों में घुंघरू भी पहनते हैं। छत्तीसगढ़ में करमा नृत्य की विभिन्न शैलियां प्रचलित हैं, छत्तीसगढ़ एवं सीमावर्ती मंडला जिले में भी करमा की परंपरा है।

माड़ी करमा- बस्तर जिले के अबूझमाड़ क्षेत्र में दण्डामी माड़िया जनजाति निवास करती है, जिनके द्वारा माड़ी करमा लोक नृत्य किया जाता है। माड़ी करमा नृत्य विशेष रूप से महिलाओं द्वारा किया जाता है। माड़ी करमा में वाद्यों का प्रयोग नहीं किया जाता। इसे माड़ी पाटा अर्थात् माड़ी करमा गीत के साथ प्रस्तुत किया जाता है। यह नृत्य किसी सामाजिक उत्सव व शुभ कार्य के अवसर पर करते हैं।

माड़ी करमा बस्तर के अलावा अन्यत्र दूसरे जिलों में प्रचलित नहीं है। यह एक विलुप्त प्राय नृत्य गीत है। जिसे बस्तर संभाग के नारायणपुर जिले के अबूझमाड़ क्षेत्र में किया जाता है। इस गीत में लड़की द्वारा अपने प्रेमी से बाजार जाकर अपने साज-सिंगार और अन्य सामग्री लाने का अनुरोध करती है।

भुंइहरी करमा- यह विशेष रूप से छत्तीसगढ़ के बिलासपुर जिले में निवासरत भुइंहार जनजाति द्वारा किया जाता है। चूंकि यह जाति बिलासपुर जिले में निवास करती है इस कारण इसे बिलासपुरी करमा के नाम से भी जाना जाता है। भुइंहार को भुंइया या भूमिया जाति के नाम से भी जाना जाता है। कार्तिक के महीने में भुंइहरी जाति ‘धरम देवता’ का पूजा उत्सव मनाते हैं। उनकी ऐसी मान्यता है कि धरम देवता का निवास स्थान करम वृक्ष है और उनकी पूजा अर्चना से उनका जीवन धन-धान्य, फल-फूल आदि से परिपूर्ण होकर सुखमय हो जाता है।

भुइंहार जाति अपने किसी कार्य के अतिरिक्त फसल के पकने पर अन्न प्राप्ति के खुशी में अपने धरम देवता को प्रसन्न करने के लिये पूजा अर्चना कर नृत्य करते हैं। भुइंहार करमा में मांदर वादक के ताल व लय में नाच कर गीत गाते हुए आकर्षक माहौल बनाकर नृत्य को गति प्रदान करते हैं।

देवार करमा- देवार गोंड जाति की उपजाति मानी जाती है। देवार एक घुमन्तु जाति है जो किसी नगर, कस्बे अथवा गांव के बाहर तंबू लगाकर डेरे में अस्थायी रूप से निवास करती है फिर उस स्थान से प्रस्थान कर लेती है। इनकी अपनी विशेष संस्कृति है जिसमें लोक संगीत एवं नृत्य का प्रमुख स्थान है। छत्तीसगढ़ में मनाये जाने वाले त्यौहारों के समान ही देवार जाति का करमा त्यौहार भी होता है।
देवार जाति बैसाख के महीने में ‘अक्ती’ (अक्षय तृतीया) दिन को शुभ मानते हैं और इस अवसर पर भी नृत्य करते हैं। देवार नर्तक शरीर पर आकर्षक साड़ी कान में खिनवा, नाक में फुल्ली, माथे में टिकली, गले में हमेल, सुर्रा, मोती माला, बाह में नागमोरी, हाथ हरैया, चूड़ी, कमर में करधन पांव में बिछिया पहनते हैं । पुरूष नर्तक धोती, कुरता, साफा, हाथ में चूड़ा पहनते हैं। ये अपने नृत्य गीत के माध्यम से अपनी ओर लोगों को आकर्षित करने की क्षमता रखते हैं। इनके नृत्य गीत को सुनकर लोग बरबस ही इनके ओर खिंचे चले आते हैं।

करमा के इन प्रकारों में कुछ ये भी हैं-
करमसेनी- करमसेनी करमा लोक नृत्य में राजा करमसेन के जीवन चरित्र का वर्णन मिलता है।
गोंडी करमा- यह छत्तीसगढ़ की गोंड जनजाति के द्वारा किया जाने वालालोकनृत्य है।
पहाड़ी करमा- पहाड़ी करमा छत्तीसगढ़ के उच्च भूमि स्थलों में निवासरत जनजातियों के द्वारा किया जाने वाला लोकनृत्य है।
बीरम करमा- पाँच भाईयों की एक लाडली बहन के बिछड़ने और दुःख से प्रेरित होकर देवार जाति के द्वारा यह लोकगीत गाया और नृत्य किया जाता है।

तलवार करमा- कलगी की विषेषताओं तथा खूबसूरती को रेखांकित करते हुये उसकी तुलना तलवार से कर गाया जाने वाला लोकगीत तलवार करमा के नाम से जाना जाता है।

कलसा करमा- कलसा करमा में सिर पर कलश रखकर नृत्य करते हैं उसे कलसा करमा कहते हैं।

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