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सबसे पुराना टैटू ..कुछ ऐसे हुआ करते थे डिज़ाइन्स

चेथी में टैटू,  हाथ में, गले में,  सीने पर ऐसा भारत में होता है, मगर विदेशों में तो बदन का कोई हिस्सा नहीं जहां टैटू के शौकिन लोग टैटू न बनवाते हों। आज का टैटू, कभी गोदना हुआ करता था। यानी मशीन की जगह गर्म सुईयों की कारिगरी।

गोदना की प्रथा आदिवासी इलाको में देखने को मिलती है। खासकर छत्तीसगढ़ में जो स्वयं में एक आदिवासी बहुल राज्य है। यहां गोदना की प्रथा सदियों से चलते आ रही है। गोदना का मतलब शरीर में सुई चुभोकर उसमें काले या नीले रंग का लेप लगाकर हाथों में नाम लिखवाना या फिर कोई धार्मिक शब्द लिखवाना या कोई चित्र बनवाना हैं।

आदिवासी इलाके बस्तर, सरगुजा, कांकेर, कवर्धा  और जशपुर में रहने वाले इस संस्कृति से जुड़े हुए है। इसमें सबसे ज्यादा बैगा जनजाति गोदना को मानते हैं। वहीं हल्बा जनजाति में गोदना को एक पारम्परिक श्रृंगार माना जाता है। इस तरह बस्तर अंचल की अबुझमाडियां दण्डामी माडियां, मुरिया, दोरला, परजा, घुरुवा जनजाति की महिलाओं में गोदना गुदवाने का रिवाज पारम्परिक है।

सदियों से चले आ रही गोदना प्रथा को लेकर आदिवासियों में कई मान्यताएं भी देखी गयी है।

इसमें कुछ जनजातियों की मानती है, कि शरीर में गोदना रहने से नजर नहीं लगती है। एक मान्यता है, की गोदना गुदवाने से शरीर बीमारियों से बच जाता है। वहीँ कुछ का मानना है जब इन्सान की मृत्यु होती है, तब उसके शरीर से सारे चीजों को निकाल लिया जाता है लेकिन सिर्फ एक गोदना होता है, जो मरने के बाद भी साथ रहता है। इसलिए इसे अमर गहना या स्वर्गिक अलंकरण भी कहते हैं।

गोदना को बनवाने की आकृति भी अलग अलग तरह की होती है। जो आदिवासियों को प्रकृति से जोड़ते हैं।

फुलबाना आकृति जो आदिवासियों को जंगल के फूलों से जोड़े रखती है। इसमें पांच , सात, नौ गोल बिंदु होते है। तितलीबाना आकृति जिसमें आदिवासी तितली को अपने हाथों में बनाते है। इसके लिए सात बिंदु का लेते है। ऐसे ही आदिवासी गोदना में जीव, जंतु, प्रकृति, से जुड़े चीजों को बनवाते है। इसमें मक्खीबाना, बिच्छुबाना, माड़ीबाना, मछलीबाना, नाम की भी आकृति होती है।

इससे यह तो पता चलता है कि जिस तरह इंसान और प्रकृति आपस में जुड़े होते है ठीक उसी तरह आदिवासी महिलाएं इन प्राकृतिक चीजों को गोदना के रूप में अपने शरीर में बनवाकर इसे संभाले रखती है।

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