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एशिया का दूसरा सबसे बड़ा चर्च छत्तीसगढ़ में, दस हज़ार लोग एक साथ कर सकते हैं प्रार्थना

आप ने प्रदेश के काफी सारे पर्यटन स्थान के बारे मे सुना होगा, देखा भी होगा। पर क्या आपने छत्तीसगढ़ के ऐसी जगह के बारे में सूना है, जो भारत ही नहीं पुरे एशिया में खास है! जिसे देखने देश से ही नहीं बल्कि विदेशो से भी पर्यटक छत्तीसगढ़ आते है।

अब आप सोच रहे होंगे की ऐसी कौन सी जगह है? तो चलिए जानते है, वो खास जगह कौन सी है! और उसमें ऐसी क्या बात है जो ये जगह पुरे एशिया में विख्यात है।

छत्तीसगढ़ प्रदेश के जशपुर जिले के कुनकुरी ब्लॉक में एक ऐसा चर्च है जो पुरे एशिया में दूसरा सबसे बड़ा चर्च है। जिसका नाम है कैथेड्रल और इस खुबसुरत चर्च के अंदर एक साथ 10,000 लोग बैठकर प्रार्थना कर सकते हैं।

इस चर्च के सूत्रधार से लेकर इसकी देखरेख करने वाले सभी लोग उरांव जनजाति से धर्मांतरण कर इसाई अपनाने वाले लोग हैं। यहां प्रार्थना से लेकर अन्य सभी कार्यक्रम उरांव भाषा में ही होते हैं।

इसका निर्माण 1962 ई. में आरम्भ हुआ था और श्रद्धालुओं के लिए इसे 27 अक्टूबर 1979 ई. को खोला गया था। इस चर्च में लोहे के सात पवित्र चिन्ह भी बने हुए हैं इस महागिरजाघर में प्रभु यीशु के क्रूस पर टंगी मूर्ति के पास ही सभी धर्मों के प्रतीक चिन्ह लगे हुए हैं। ऐसा कम ही धर्मस्थल में दिखता है। इसे इस तरह बनाया गया है कि पूरी बिल्डिंग एक ही बीम पर टिकी हुई है।
इस चर्च की कहानी कुछ ऐसी है चर्च निर्माण शुरू होने के बाद कुछ समय बाद कार्य रोकना पड़ गया था। तब स्थानीय आदिवासियों ने श्रमदान कर निर्माण पूर्ण किया था। साल 1970 में फ्रांसिस एक्का डीडी रायगढ़ – अंबिकापुर के धर्माध्यक्ष बनकर आए। इस समय तक चर्च की आर्थिक स्थिति बेहद खस्ताहाल थी, जिसके कारण 1971-78 तक चर्च निर्माण कार्य बंद रहा। इसके बाद एक परोपकारी संस्थार रव्रीस्तियों की मदद से फिर निर्माण कार्य शुरू किया गया, लेकिन आर्थिक स्थिति अभी भी ज्यादा अच्छी नहीं थी। इसको देखते हुए मीटिंग के बाद ईसाई समुदाय के रायगढ़ धर्मप्रांत के अनुयायियों ने यह निर्णय लिया कि वे चर्च के निर्माण में श्रमदान और सहयोग राशि दोनों देंगे और साल भर के अंदर महागिरजाघर अस्तित्व में आ गया। इस चर्च को 1979 में लोगों के लिए खोल दिया गया।

चर्च की कुछ ख़ास बाते

महागिरजाघर में सभी धर्मों के लोग पहुंचते हैं। हर साल करीब 5 लाख लोग इसके सौंदर्य को देखने पहुंचते हैं। कुनकुरी का महागिरजाघर वास्तुकला का बेजोड़ नमूना है। यह अन्य गिरजाघरों से भव्य एवं अत्यंत सुंदर है। इसकी सुंदरता, सजावट, प्रार्थना भव्यता की चर्चा देश भर में होती है। दिसंबर में यहां ज्यादा लोग देखने आते हैं।
इसाई धर्मग्रंथों में सात को पूर्णता का प्रतीक माना गया है। महागिरजाघर के सात दरवाजे सभी के लिए खुले होते हैं। एक छत के नीचे सारे लोगों को समेटते हैं। सात ग्रिल में सातों संस्कार को रेखांकित करते हुए उनका चित्रांकन किया गया है। महागिरजाघर एक ही बीम पर टिका हुआ है जो इंजीनियरिंग का बेजोड़ नमूना है।

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