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छत्तीसगढ़ी राजभाखा दिवस में जाने कुछ रोचक बातें, कहां से हुई उत्त्पत्ति

आज छत्तीसगढ़ी राज्य भाषा दिवस है। छत्तीसगढ़ी भाषा बोलते तो प्रदेश के 2 करोड़ लोग है। लेकिन क्या आप जानते है ..कि यह भाषा आई कहां से, यह भाषा का नाम छत्तीसगढ़ी क्यों पड़ा ?

आइए अपनी छत्तीसगढ़ी भाषा को और करीब से जानते है।

छत्तीसगढ़ी भाषा का सबसे प्राचीन नाम कोसली था। करीब ढाई सौ साल पहले जब छत्तीसगढ़ को “दक्षिण कौशल” के नाम से जाना जाता था,  उस समय छत्तीसगढ़ी को कोसली कहा जाता था…उसके कुछ समय बाद छत्तीसगढ़ राज्य नाम को लेकर इसे छत्तीसगढ़ी कहा जाने लगा।

छत्तीसगढ़ी भाषा को लेकर अनुमान लगाने पर पता चलता है कि यह भाषा ईसा पूर्व तृतीय शताब्दी से चले आ रही है। जिसके प्रमाण प्राचीन शिलालेख में देखे जा सकते है। एक ऐसे ही शिलालेख में छत्तीसगढ़ी का प्रमाण 1703 ईस्वी के दन्तेवाड़ा के दंतेश्वरी मंदिर के मैथिल पण्डित भगवान मिश्र द्वारा लिखित शिलालेख में देखा गया है।

दंतेवाड़ा के दंतेश्वरी मंदिर के गर्भ गृह के प्रवेश द्वार की दीवार पर छत्तीसगढ़ी शिलालेख है। इतिहासविद् डॉ. रमेन्द्रनाथ मिश्र ने इस शिलालेख को 31 मार्च 1702 में बस्तर क्षेत्र के तत्कालीन राजा के राजगुरू और मैथिल पंडित भगवान मिश्र द्वारा लिखा बताया है।

छत्तीसगढ़ी को लेकर एक रोचक बात यह भी है कि बहुत से भाषाओं में जुड़ी हुई है..पूर्व में उड़िया से, उत्तर में हिंदी से, पश्चिम में मराठी से और दक्षिण में तेलगु से। पूरे छत्तीसगढ़ में छत्तीसगढ़ी भाषा तो एक है लेकिन इसके रूप अलग-अलग हैं  और इनके रूपों को देखते हुए इनके नाम भी अलग-अलग है।  

छत्तीसगढ़ी – रायपुर, बिलासपुर और दुर्ग में जो बोली सुनाई देती है, वह छत्तीसगढ़ी है।

खल्टाही – छत्तीसगढ़ की यह बोली रायगढ़ ज़िले के कुछ हिस्सों में बोली जाती है। यह बोली बालाघाट ज़िले के पूर्वी भाग में, कौड़िया में,  साले-टेकड़ी में और भीमलाट में सुनाई देती है।

सरगुजिया – सरगुजिया छत्तीसगढ़ी बोली सरगुजा में प्रचलित है। इसके अलावा कोरिया और उदयपुर क्षेत्रों में भी बोली जाती है।

लरिया – छत्तीसगढ़ कीे यह बोली महासमुंद, सराईपाली, बसना, पिथौरा के आस-पास बोली जाती है।

सदरी कोरबा – जशपुर में रहने वाले कोरबा जाति के लोग जो बोली बोलते हैं, वह सदरी कोरबा है। कोरबा जाति के लोग जो दूसरे क्षेत्र में रहते हैं, जैसे- पलमऊ, सरगुजा, बिलासपुर आदि, वे भी यही बोली बोलते हैं।

बैगानी – बैगा जाति के लोग यह बोली बोलते हैं। यह बोली कवर्धा, बालाघाट, बिलासपुर, संबलपुर में बोली जाती है।

बिंझवारी – बिंझवारी क्षेत्र में जो बोली प्रयोग की जाती है, वही है बिंझवारी। वीर नारायन सिंह भी बिंझवार के थे। रायपुर, रायगढ़ के कुछ हिस्सो में यह बोली प्रचलित है।

बस्तरी या हलबी – ये बोली बस्तर में हलबा जाति के लोग बोलते हैं। इस बोली पर मराठी का प्रभाव पड़ा है

इस तरह अनेक रूप होने के बाद भी छत्तीसगढ़ में छत्तीसगढ़ी एक अपनेपन का छाप छोड़ ही देती है।

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