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बाल दिवस पर छत्तीसगढ़ के कूटरु और बाल आश्रम की दिलचस्प कहानी, कैसे बने मधुकर राव असहाय बच्चों के लिए चाचा नेहरू

छत्तीसगढ़ के बीजापुर जिला में एक छोटा सा गांव कुटरू है, यहां सैकड़ों अनाथ बच्चों के लिए मधुकर राव चाचा नेहरु से कम नहीं! यहां रह कर पढने वालों वो बच्चे हैं जिनके माता-पिता की सलवा जुडूम के दौरान नक्सली हिंसा में मौत हो गई थी। ऐसे में उन बच्चों के लिए मधुकर राव एक उम्मीद बनकर आये और उन्हें न सिर्फ सहारा दिया बल्कि उनके पढाई लिखाई का जिम्मा उठाया। मधुकर राव चाहते हैं कि उनके बच्चे पढ़ लिखकर शिक्षित हो और हर क्षेत्र में आगे बढे।

आश्रम में पहली से आठवीं तक की कक्षाएं चलती हैं। गांव के ही चार युवक अल्प मानदेय लेकर बच्चों को पढ़ाते हैं। मधुकर को छात्र पिता तुल्य मानते हैं। वे उन्हें ‘बड़े सर” कह कर बुलाते हैं। मधुकर कहते हैं कि यह सब लोगों की मदद से हो रहा है। यहां बच्चों को किताबी ज्ञान के साथ-साथ खेलकूद, गीत-संगीत से भी जोड़ा जाता है। उनके हाथों में बंदूक की जगह किताबें हों, यही उनका मकसद है।

छत्तीसगढ़ समाज संरक्षण एवं विकास समिति द्वारा संचालित पंचशील आश्रम शाला के संस्थापक के। मधुकर राव के मुताबिक साल नक्सलियों के खिलाफ एकजुट होने वाले अधिकांश ग्रामीणों की नक्सलियों ने हत्या कर दी। इसी दौरान बेसहारा बच्चों को संरक्षण और शिक्षा देने के उद्देश्य से संस्था की स्थापना की गई। यहां ऐसे बच्चों की परवरिश की जाती है, जिनके माता पिता की हत्या नक्सलियों द्वारा की गई है।

शुरुआत में संस्था का संचालन पंचायत भवन में 25 बच्चे से किया। अब 157 बच्चों का पालन पोषण किया जा रहा है। क्षेत्र के व्यापारी, शिक्षक, पुलिस और अन्य लोग सहयोग करते हैं। स्कूल में बिना वेतन के सेवा दे रहे शिक्षक मंजू लकड़ा, कंचन लकड़ा, ममता कोरसा, राजेश मड़े और कीर्ति कुजूर ने बताया कि वे राशि की अपेक्षा नहीं रखते क्योंकि इन बच्चों को शिक्षा देकर उन्हें काफी गौरवांवित महसूस होता है। बेसहारा बच्चों की परवरिश, शिक्षा और आदिवासियों की सेवा तथा आर्थिक उत्थान के लिए वर्ष 2014 में संस्था को छत्तीसगढ़ शासन द्वारा डॉ। भंवर सिंह पोर्ते आदिवासी स्मृति सेवा से भी नवाजा गया।

मधुकर राव के मुताबिक वर्ष 2008 में नक्सलियों के खिलाफ एकजुट होने वाले अधिकांश ग्रामीणों की नक्सलियों ने हत्या कर दी। इसी दौरान बेसहारा बच्चों को संरक्षण और शिक्षा देने के उद्देश्य से संस्था की स्थापना की गई। यहां ऐसे बच्चों की परवरिश की जाती है जिनके माता पिता की हत्या नक्सलियों द्वारा की गई है। शुरुआत में संस्था का संचालन पंचायत भवन में 25 बच्चे से किया। अब 157 बच्चों का पालन पोषण किया जा रहा है। वर्तमान में संस्था संचालन राहत शिविर में हो रहा है। संचालक राव के अनुसार संस्था को किसी तरह की सरकारी मदद नहीं मिलती। क्षेत्र के व्यापारी, शिक्षक, पुलिस और अन्य लोग सहयोग करते हैं। स्कूल में बिना वेतन के सेवा दे रहे शिक्षक मंजू लकड़ा, कंचन लकड़ा, ममता कोरसा, राजेश मड़े और कीर्ति कुजूर ने बताया कि वे राशि की अपेक्षा नही रखते क्योंकि इन बच्चों को शिक्षा देकर उन्हें काफी गौरवांवित महसूस होता है।

लाचार बच्चों को चलना सिखाया

संस्था में एक ऐसे बच्चे भी हैं जो कभी हाथ-पैर से लाचार थे। अब वे बैसाखियों के सहारे चलने लगे हैं। ऐसे ही एक बालक राजू वाचम है। उसके संबंध में बताया गया कि बच्चे को जब संस्था में लाया गया था तब यह जमीन पर घसीट कर चला करता था, इसके हाथ-पैर शून्य हो चुके थे। हाथों के बजाए सीधे मुंह बर्तन लगाकर पानी पीया करता था। संस्था के लोग उसे खाना खिलाते थे परंतु करीब दो वर्षों तक लगातार मालिश और मसाज से इसके हाथ-पैर काम करने लगे हैं। अब वह स्वयं बैसाखियों के सहारे चलने साथ अपने हाथों से खाना खाने लगा है। कक्षा सातवीं में अध्ययनरत छात्र राजू बैंक अफसर बनने की इच्छा रखता है।

मधुकर राव सालव जुडूम के संस्थापक सदस्यों में एक है, उनके साथ के अधिक नेताओं की नक्सलियों ने हत्या कर दी है। मधुकर राव को लेकर भी नक्सलियों ने उनका डेथ वारंट जारी कर रखा है। इसलिए वे कड़ी सुरक्षा के बीच कुटरू गांव में ही रहते हैं। मधुकर जो कुछ बेसहारा बच्चों के लिए कर रहे हैं और जो बच्चों के लिए उनका प्रेम है उसे देखकर लगता है कि वे आज के दौर के चाचा नेहरु हैं।

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