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ट्वीटर पर लगा जातिवाद और भेदभाव का आरोप, दलितों ने खोला मोर्चा

ऐसा पहले शायद ही किसी ने सुना होगा , कि किसी सोशल नेटवर्किंग साइट पर “जातिवाद , भेदभाव” के इल्ज़ाम लगाए गए हो। अब तक “जातिवाद” का आरोप राजनेताओं पर या किसी सरकारी तंत्र पर लगता दिखाई देता था, लेकिन अब सोशल मीडिया साइट्स पर भी इस तरह का आरोप देखने मिल रहा है।

जी हाँ! ऐसा पहली बार हो रहा है, जब सोशल मीडिया के माइक्रो ब्लॉगिंग साइट “ट्विटर” भी आरोपों के कटघरे में खड़ा दिखाई दे रहा है, आरोप भी छोटा नहीं “जातिवाद, भेदभाव” जैसे बड़े विषयों के साथ है । क्या सच में कोई सोशल नेटवर्किंग साइट “जातिवाद” जैसा भेदभाव कर सकता है ? क्या सच में ट्वीटर भेदभाव करता है ?

ट्विटर के खिलाफ यह मुहीम “दलित , मुसलमान , अल्पसंख्यक” समुदाय ने छेडा हुआ है । दलित समुदाय का कहना है , ट्विटर दलितों के साथ भेदभाव कर रहा है, हजारों की संख्या में फॉलोअर्स होने के बाद भी दलितों का अकाउंट वेरिफाई नहीं किया जाता, ना ही उन्हें ब्लू टिक दिया जाता है।

दरअसल ट्विटर ने कुछ दिन पहले प्रोफेसर दिलीप सी मंडल के अकाउंट को सस्पेंड कर दिया। ट्विटर का कहना था कि उन्होंने एक लेखक से जुड़े संपर्क विवरण को ट्वीट करके प्राइवेसी नियमों का उल्लंघन किया। लेकिन, कुछ दिनों बाद उनके अकाउंट को बहाल कर दिया गया और उसे वेरिफाई भी किया। इसी के बाद से भारत में ट्विटर के खिलाफ तरह-तरह के हैशटैग चलाए गए।

इस मुहिम को छेड़ने वाले प्रोफेसर का कहना है

ट्विटर के खिलाफ तरह तरह के हैशटैग चलाने वाले प्रोफेसर दिलीप सी मंडल कहते हैं, “ट्विटर ने संवाद के मंच को अलोकतांत्रिक, मनमाना और वर्गीकृत कर दिया है। सोशल मीडिया साइट में कुछ लोग नेतृत्व करने की क्षमता में रहते हैं और कुछ लोग सिर्फ बात सुनने या पढ़ने तक ही सीमित हैं या वह भी नहीं, जबकि ट्विटर तो संवाद का बड़ा मंच है। ट्विटर के माध्यम से विचार बनते हैं। ऐसे में, पिछड़े तबके के ऐसे वक्ता हैं जिनके लाखों फॉलोअर हैं, लेकिन ट्विटर उन्हें ब्लू टिक या वेरिफाई नहीं करता।”

इस आरोप पर ट्विटर का जवाब

जातिवादी संबंधी विवाद के बीच ट्विटर ने एक बयान जारी कहा है ट्विटर के अपने नियम और शर्ते है ,  “चाहे नीति की बात हो, प्रोडक्ट से जुड़े फीचर या नियमों का लागू करने की बात हो ट्विटर ने कभी पक्षपात नहीं किया। हम कभी किसी एक विचारधारा या फिर राजनीतिक दृष्टिकोण के आधार पर फैसले नहीं लेते।”

मुहिम पर बाकियों की राय

वरिष्ठ पत्रकार आशुतोष कहते हैं कि ट्विटर को अकाउंट वेरिफेकशन नीति को सामने लेकर आना चाहिए और उसे बताना चाहिए कि आखिर किस वजह से दलित और पिछड़े वर्ग से जुड़े लोगों का अकाउंट वेरिफाई नहीं हो रहा है। आशुतोष के मुताबिक, “सवाल ब्लू टिक का नहीं है बल्कि सवाल तो भागीदारी का है। पिछड़ा तबका ट्विटर पर भी अपनी भागीदारी चाहता है। पिछड़े समाज के लोगों की यह मांग वैध है और ट्विटर को सामने आकर वेरिफिकेशन प्रक्रिया के बारे में बताना चाहिए। “

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