स्टोरी

राम मंदिर केस में जिस केके मुहम्मद की हो रही जमकर तारीफ, उन्होंने ही छग में इन जगहों को खोजा है

रायपुर। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के पूर्व निर्देशक के के मुहम्मद की जमकर तारीफ हो रही है। वजह है! उनके द्वारा दिए गए सबूतों के आधार पर ही कोर्ट इस निष्कर्ष पर पहुंचा कि अयोध्या में एक भव्य मंदिर था। इसी आधार पर सुप्रीम कोर्ट ने हिन्दुओं के पक्ष में फैसला सुनाया है। इस चर्चा के बीच हम आपको बताते हैं कि के के मुहम्मद ने छत्तीसगढ़ में दो ऐसे जगह खोजे जो न सिर्फ पर्यटन केंद्र बना है बल्कि वहां से लोगों की आस्था भी जुडी है।

के के मुहम्मद ने छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा में बारसूर मंदिर और सामलूर मंदिर को सबसे पहले खोजा है। उन्हें इनके संरक्षण का काम भी किया।  यह माना जाता है कि बारसूर में इसके अच्छे दिनों में लगभग 150 मंदिर थे। उनमें से एक 11वीं शताब्दी का चंद्रादित्य मंदिर है। यह माना जाता है कि इसका निर्माण सामंती सरदार चंद्रादित्य द्वारा करवाया गया था और उसके नाम पर ही इसका नाम पड़ा। यहां पर पाए गए बारसूर शैली की अनेक मूर्तियों में गर्भगृह के दरवाजे पर विष्णु और शिव की संयुक्त प्रतिमा हरी-हर की भव्य मूर्ति है। खंडित मूर्ति में से, महिषासुरमर्दिनी, जिसे स्थानीय रुप से दंतेश्वरी कहते हैं। जिनकी मूर्ति को अभी भी पहचाना जा सकता है। बलिदानों का चित्रण करती हुई मूर्तियां और मंदिर के कोनों में अलंकृत नंदी बैठे हुए हैं।

दूसरा शिव मंदिर चंद्रादित्य मंदिर से कुछ ही दूरी पर है जो अपने मंडप के कारण विख्यात है, जिसमें 32 खंभे हैं, जिन्हें चार पंक्तियों में बनाया गया है। यह बत्तीशा मंदिर के नाम से लोकप्रिय है। यहां पर यह जानना दिलचस्प है कि मंदिर में प्रयोग में लाये गए सभी खंभे (प्रत्येक की ऊंचाई दो मीटर से अधिक है) पत्थर के बने हैं। आठ मीटर चौड़े और एक मीटर ऊंचे वर्गाकार चबूतरे पर बना यह मंदिर दो एक समान गर्भगृहों की उपस्थिती के कारण अद्भुत हैं, जिनसे जुड़ा एक मात्र विशाल नंदी है।

अन्य दो मंदिर की तुलना में यह बेहतर स्थिति में है। इसे एक अच्छी तरह सरंक्षित वक्रीय शिखर के साथ ऊपर उठाए गए ढलवा आधार पर बनाया गया है। इसके चबूतरे पर एक 13वीं शताब्दी के तेलगू शिलालेख से मंदिर निर्माण की तारीख का पता चलता है। इसके नजदीक कभी एक गणेश मंदिर रहा होगा, लेकिन आज केवल भवन के अवशेष बचे हैं। सौभाग्य से मंदिर में दो बड़ी मूर्तियां बची हैं, बड़ी लगभग 2.5 मीटर ऊंची है और इसकी परिधि पांच मीटर से अधिक है।

मूर्तिकला की शास्त्रीय बारसूर शैली की विशेषता एक छोटी गर्दन और एक चोकौर और सपाट चेहरा, गोल अंग, छोटा, माथा, चपटे बाल और टोपी है। यहां तक कि कपड़े की नक्काशी इस बात का संकेत देती है कि वास्तविक जीवन में, यह शायद सूती का बना हुआ था, जो इस काल के शास्त्रीय मंदिरों में मध्यकालीन मूर्तिकला में प्रदर्शित महीन मलमल अथवा सिल्क से भिन्न था।

समलूर मंदिर

करौली महादेव मंदिर, दंतेवाड़ा जिले के गीदम ब्लॉक के समलूर मेंस्थित है। यह मंदिर 11वीं शताब्दी का है। केंद्रीय पुरातत्व विभाग नेइसे संरक्षित स्मारक घोषित किया है। क्षेत्र के पुरातत्व के जानकार युवा ओम सोनी के मुताबिक छिंदकनागवंशी शासक सोमेश्वर देव का शासन काल (1069 से 1109) के दौरान इस मंदिर का निर्माण उनकी पत्नी महारानी सोमल महादेवी ने कराया था।

उत्कल शैली में निर्मित इस मंदिर की बनावट बारसूर के मामा-भांजा मंदिर और नारायणपुर के विष्णु मंदिर से मिलती-जुलती है। नारायणपुर और मामा-भांजा मंदिर की तर्ज पर इस मंदिर में भी गर्भगृह व अर्धमंडप है। इस मंदिर के शिवलिंग की खास बात यह है कि इसका शिवलिंग पश्चिम मुखी है, जबकि बस्तर में ज्यादातर शिवलिंग पूर्वाभिमुख है।

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published.