छ.ग. सिनेमा/कला

छत्तीसगढ़ संस्कृति का विस्तार करेंगे छत्तीसगढ़ के नन्हें कलाकार

छत्तीसगढ़ की मधुर और सरल संस्कृति ने पुरे विश्व को आकर्षित किया है। जहां अपने छत्तीसगढ़ की माटी का बात आता वहां तो सबका सीना चौड़ा हो जाता है। छत्तीसगढ़ की संस्कृति को यदि विश्व में पहचान मिली है तो इसका मुख्य कारण है लोक कला के क्षेत्र में काम करने वाले हमारे कलाकार जिन्होंने ने अपने घर परिवार की  चिंता न करते हुए छत्तीसगढ़ महतारी का मान बढाने अपना सर्वस्व लुटा दिया।

छत्तीसगढ़ की प्रसिद्ध पंडवानी गायिका तीजन बाई का नाम कौन नहीं जानता। इसी तरह चोला माटी के राम गा कर जिस लोक गायिका ने गीता भागवत के महत्व को छत्तीसगढ़ी भाषा में जन – जन तक पहुंचाया। स्व. लक्षमण मस्तुरिया के भाव भरे गीत ने सामाजिक समरसता को प्रदेश में बढाया है। उनका मोर संग चलव रे मोर संग चलव न इस गीत ने गांवों से सामाजिक भेदभाव को समाप्त किया। दुकालू यादव के जसगीत ने छत्तीसगढ़ संस्कृति में भक्तिधारा को मूर्त रूप दिया।

संस्कृति के विस्तार में प्रदेश के सभी कलाकारों ने अपना अहम भूमिका निभाया है। आज छत्तीसगढ़ छालीवुड के भीष्म मोहन सुन्दरानी के मार्गदर्शन में श्री सुन्दरानी प्रदेश भर से नन्हें कलाकारों के खोज में लगे हैं। इनके माध्यम से लोक परम्परा का वैश्विक प्रचार हो सकेगा। बाल कलाकारों के माध्यम से प्रदेश की संस्कृति लोकगीत, लोकनृत्य के माध्यम से जग विख्यात हो रही है। आरू साहू जैसे बाल क़लाकारों ने प्रदेश में अपना धूम मचाया है। राज्योत्सव में आरू साहू के गीत ने सबको अपनी और आकर्षित किया। इसलिए मोहन सुन्दरानी प्रदेश में नन्हे कलाकारों के खोज में लगे हैं। {“

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