Uncategorizedस्टोरी

स्वच्छ भारत के दौर में क्यों खतरे में प्रकृृति का सफाईकर्मी पक्षी

साभार : सत्यप्रकाश पाण्डेय
कथा-कहानियों में मृत्यु के प्रतीक माने जाने वाले गिद्ध आज खुद मौत के मुंह में खड़े हैं, उन्हें संरक्षण की दरकार है । ख़ुशी इस बात की है कि Egyptian vulture छत्तीसगढ़ राज्य के विभिन्न हिस्सों में अब दिखाई देते है लेकिन संख्या नहीं के बराबर है। पिछले तीन-चार साल से बिलासपुर जिले की सरहद में अलग-अलग जगहों पर दिखाई पड़े सफ़ेद गिद्ध [Egyptian vulture] वैसे तो अपने लौट आने का संदेश दे चुके हैं लेकिन उनके पुनरुत्थान के लिए फौरन कोई कदम नहीं उठाया जाता तो ये पुनः विलुप्त होने से महज एक कदम दूर हैं।
बिलासपुर जिले के ग्राम मोहनभाठा में कल [20 अक्टूबर 19] को सफ़ेद गिध्दों का परिवार दिखाई पड़ा जिसमें दो वयस्क के साथ बच्चे भी हैं । सफेद गिद्धों की वापसी को लेकर पक्षी मित्र या फिर संबंधित अमला कितना गंभीर है ये किसी यक्ष प्रश्न से कम नहीं लेकिन पर्यावरण संतुलन में अपनी सहभागिता के लिए सफेद गिद्ध लौट आये हैं।
सफ़ेद गिद्ध अपने अन्य प्रजाति के पक्षियों की तरह मुख्यतः लाशों का ही सेवन करता है लेकिन यह अवसरवादी भी होता है और छोटे पक्षी, स्तनपायी और सरीसृप का शिकार कर लेता है। अन्य पक्षियों के अण्डे भी यह खा लेता है और यदि अण्डे बड़े होते हैं तो यह चोंच में छोटा पत्थर फँसा कर अण्डे पर मारकर तोड़ लेता है। दुनिया के अन्य इलाकों में यह चट्टानी पहाड़ियों के छिद्रों में अपना घोंसला बनाता है लेकिन भारत में इसको ऊँचे पेड़ों पर, ऊँची इमारतों की खिड़कियों के छज्जों पर और बिजली के खम्बों पर घोंसला बनाते देखा गया है।
यह जाति आज से कुछ साल पहले अपने पूरे क्षेत्र में पर्याप्त आबादी में पायी जाती थी। 1990 के दशक में इस जाति का 40% प्रति वर्ष की दर से 99% पतन हो गया। इसका मूलतः कारण पशु दवाई डाइक्लोफिनॅक (diclofenac) है जो कि पशुओं के जोड़ों के दर्द को मिटाने में मदद करती है। जब यह दवाई खाया हुआ पशु मर जाता है और उसको मरने से थोड़ा पहले यह दवाई दी गई होती है और उसको सफ़ेद गिद्ध खाता है तो उसके गुर्दे बंद हो जाते हैं और वह मर जाता है। अब नई दवाई मॅलॉक्सिकॅम meloxicam आ गई है और यह गिद्धों के लिये हानिकारक भी नहीं हैं।
गिद्धों को प्रकृति का सफाईकर्मी कहा जाता है। वे बड़ी तेजी और सफाई से मृत जानवर की देह को सफाचट कर जाते हैं और इस तरह वे मरे हुए जानवर की लाश में रोग पैदा करने वाले बैक्टीरिया और दूसरे सूक्ष्म जीवों को पनपने नहीं देते। लेकिन गिद्धों के न होने से टीबी, एंथ्रेक्स, खुर पका-मुंह पका जैसे रोगों के फैलने की काफी आशंका रहती है। इसके अलावा चूहे और आवारा कुत्तों जैसे दूसरे जीवों की संख्या में तेजी से बढ़ोतरी हुई। इन्होंने बीमारियों के वाहक के रूप में इन्हें फैलाने का काम किया। आंकड़े बताते हैं कि जिस समय गिद्धों की संख्या में कमी आई उसी समय कुत्तों की संख्या 55 लाख तक हो गई। इसी दौरान (1992-2006) देश भर में कुत्तों के काटने से रैबीज की वजह से 47,300 लोगों की मौत हुई।
कहते हैं कि मवेशियों के इस्तेमाल के लिए डिक्लोफिनेक पर प्रतिबंध लगा दिया गया है लेकिन अब भी ऐसी दवाएं इस्तेमाल की जा रही हैं जो गिद्धों के लिए जहरीली हैं। जल्द से जल्द इन पर भी रोक लगाने की जरूरत है। इनमें से कुछ हैं एसीक्लोफेनाक, कारप्रोफेन, फ्लुनिक्सिन, केटोप्रोफेन। हालांकि, दवा कंपनियां इन पर प्रतिबंध का जोरशोर से विरोध करेंगी जैसा डिक्लोफिनेक के समय किया था। लेकिन अगर प्रकृति का संतुलन गड़बड़ाने से बचाना है तो देर सबेर ही सही यह कदम उठाना होगा।

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published.